मै रिजु इन बात सु।
सुन लीजो नर नार।।
मेरा होय मोकु मिले।
तब पावे दीदार।।
तो पावे दीदार।
निजमन सुंपो लाई।।
तब प्रगटे तन माय।
अखंड नख चख विच आयी।।
सुखराम कहें इन रित बिन।
हंस न उतरे पार।।
मै रिजु इन रित सु।
सुन लीजो नर नार।।
...............( सतगुरु मेहेर )
केस बराबर अंतरों।
जे हंस राखो कोय।।
तो आ किरपा ना बने।
एसी कुदरत होय।।
एसी कुदरत होय।
निजमन माने नाही।।
कपट लिया आधीन।
ताय पर जावे नाही।।
सुखराम कहें पच पच मरो।
गरज सरे नही कोय।।
केश बराबर अन्तरो।
जे नर राखो कोय।।
...............( सतगुरु मेहेर )
केवल को सुण बिज।
गेब सु जन में आवे।।
नही करनी के माय।
ग्यान सुई भेद न पावे।।
ना केवल उपदेश।
मांड में रहे न कोई।।
जहाँ प्रगटे जन माय।
सो तारे हंस सोई।।
सुखराम अनंत ले उधऱ्या।
से जन हंस जूग माय।।
ग्यानी ध्यानी जक्त सु।
आ कल लखी न जाय।।
...............( सतगुरु मेहेर )
।। आदि सतगुरु सुखराम जी महाराज ने धिन्न हो।।
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