हरि बिनु तेरो को न सहाई।
काकी मात-पिता सुत बनिता,
को काहू को भाई॥
धनु धरनी अरु संपति
सगरी जो मानिओ अपनाई।
तन छूटै कुछ संग न चालै,
कहा ताहि लपटाई॥
दीन दयाल सदा दु:ख-भंजन,
ता सिउ रुचि न बढाई।
नानक कहत जगत सभ मिथिआ,
ज्यों सुपना रैनाई॥
............................... नानक
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