Monday, 24 March 2014

संत दादू साहेब

सतगुरु पसु मानस करै,
मानस थैं सिध सोइ।
दादू सिध थैं देवता,
देव निरंजन होइ ।।

दयामूर्ति सतगुरु,
दृढ़ मति (निश्चल बुद्धि) जिज्ञासु को विषयों की दासता रूप पशुता से बचाकर मनुष्य बनाते है
और
स्त्री, पुत्र, पौत्र आदि की
कामना वाले मनुष्यों को ज्ञान उपदेश द्वारा सिद्ध बनाते हैं
अर्थात्
राम-नाम में एकाग्र बुद्धि करते हैं।
तत्पश्चात् चमत्कार अहंकार की सिद्धाई से देव अर्थात् सगुण व निर्गुण ब्रह्म में एकाग्र करते हैं।
जिससे वह असीम ऐश्वर्य अनुभव करने
लगता है।
किन्तु सिद्ध और देव पद भी मायिक ही हैं, अर्थात्  मायावी हैं तो सतगुरु की अति सामर्थ्य क्या हुई ?
इस शंका का समाधान करके कहते हैं कि "देव निरंजन होइ''
अर्थात् सर्व सामर्थ्यवान् सतगुरु जिज्ञासु को देव पद से उपदेश द्वारा निरंजन निराकार स्वरूप भी बना लेते हैं। अत:
सतगुरु सर्वसमर्थ हैं |

सर्व सामर्थ्यवान सतगुरु पशु को भी कृपा करके राम - नाम उपदेश द्वारा मुक्त करते हैं,
जैसे :- बनजारे के बैलों और गुठले के प्रदेश में गायों का उद्धार किया है और मनुष्यों को भी राम - नाम के उपदेश द्वारा संसार बन्धन से मुक्त किया है।
सतगुरु ज्ञानोपदेश द्वारा सिद्धों को भी मुक्त करते हैं, जैसे आमेर में काबुल के घोड़ों को देखते हुए दो सिद्धों का प्रसंग है।

दोई सिद्ध स्वामी पै आये,
घोड़ा देख रु मन मुस्काये।
स्वामी कहैं कहाँ चित्त दीन्हां,
नीले कान सु आगे कीन्हा।।

दो सिद्ध उत्तराखंड से सुरति रूपी शरीर द्वारा, आमेर में दादू जी की गुफा में पहुँचे। दादू जी ध्यानावस्था में थे।
वे दोनों सिद्ध सुरति से काबुल में दौड़ के घोड़े देखने लगे और यह विचार किया कि इस आनन्द को हम ही देखते हैं, दादू जी नहीं देख रहे हैं।
तब दादू दयाल जी ने उन सिद्धों को उपदेश किया
"मायिक पदार्थों में क्या दिल दिया ?
और दिया भी तो ठीक से देखो।
आगे कौन- सा घोड़ा है ?''
सिद्धों ने कहा- " दोनों बराबर हैं।''
दादू जी ने कहा- " नीले घोड़ें के कान आगे हैं।''

कृपालु सतगुरु राम-नाम के प्रभाव से सिद्धों को भी मुक्त करते हैं। जैसे करडाले में प्रेत का आख्यान आता है। मनुष्यों की चार श्रेणी मानी हैं - पामर, विषयी, जिज्ञासु
और मुक्त। शास्त्रों में पहले पामर श्रेणी के मनुष्य को उपदेश का अधिकारी नहीं माना जाता है।

श्री सतगुरु की अति कृपा से ज्ञानोपदेश द्वारा वारा, तीनों श्रेणी के जिज्ञासुजों को मुक्त करते हैं, यही सतगुरु की अति सामर्थ्य है।

भोज नृपति को देखि के,
कन्या ढक्यो न सीस।
नृप पूछी गुरु पै गयो,
मनुष्य लक्षण बत्तीस।।

एक समय राजा भोज दौरा करके अपने नगर में वापिस लौट रहे थे। चार कन्याएँ कुए पर खड़ी थीं। राजा को देखकर तीन लड़कियों ने सिर ढक लिया। उनमें से
एक ने नहीं ढका। बाकी तीन सहेलियों ने उसे भी सिर ढकने को कहा, क्योंकि राजा आ रहा है।
उसने कहा - यह राजा नहीं, यह पशु है । राजा ने पूछा :- पुत्री, मैं पशु कैसे हूँ ?
कन्या ने कहा मेरे गुरु बताएँगे, जो नाग पहाड़ पर रहते हैं।
राजा वहाँ पर गया।
गुफा के दरवाजे पर सिला लगी देखी।
राजा ने आवाज लगाई -
" दर्शन करने आया हूँ ''
अन्दर से संत जी बोले :- " कौन हो ?''
" मैं राजा हूँ ''
" फिर अन्दर आ जाओ।''
राजा ने कहा- '' सिला लगी है।''
संत जी बोले :- " तुम सत्य बोलो कौन हो ?''
फिर कहा " मैं राजा हूँ।''
संत जी बोले - "
राजा तो एक राम हुआ है, उसके समान हो तो हाथ लगाओ, सिला स्वयं हट जाएगी।'' राजा ने हाथ लगाया परन्तु सिला नहीं हटी। संत जी ने कहा :-
" सत्य बोलो।'' तब
राजा बोला - " मैं क्षत्रिय हूँ।''
संत जी बोले :- " क्षत्रिय
तो एक अर्जुन हुआ है।
वैसा पराक्रम है तो हाथ लगाओ, सिला हट जायेगी।''
राजा बोला :- " सिला नहीं हटती।''
संत जी पुन: बोले :- " सत्य बोले, कौन हो ?''
राजा बोला- " मैं मनुष्य हूँ ''
संत जी बोले, " इस समय मनुष्य तो एक
राजा भोज है। आप वह हैं तो हाथ लगाओ सिला हट जाएगी।''
राजा ने हाथ लगाया, सिला एक दम हट गई। सन्तजी को नमस्कार किया और दर्शन करके राजा भोज उनके उपदेश से अपने में एक मानव का निश्चय करके कृत -कृत्य हो गया।

(श्री दादूवाणी - गुरुदेव का अंग)

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