Sunday, 23 March 2014

अवस्था - दादू साहेब

(बाल्यावस्था)

पहले पहरे रैणि दे,
बणिजारिया,
तूँ आया इहि संसार वे ।
मायादा रस पीवण लग्गा,
बिसार्या सिरजनहार वे ।
सिरजनहार बिसारा किया पसारा,
मात पिता कुल नार वे ।
झूठी माया आप बँधाया,
चेतै नहीं गँवार वे ।
दादू दास कहै,
बणिजारा,
तूँ आया इहि संसार वे ॥ १ ॥

(तरुण अवस्था)

दूजे पहरै रैणि दे,
बणिजारिया,
तूँ रत्ता तरुणी नाल वे ।
माया मोह फिरै मतवाला,
राम न सक्या संभाल वे ।
राम न संभाले,
रत्ता नाले,
अंध न सूझै काल वे ।
हरि नहीं ध्याया,
जन्म गँवाया,
दह दिशि फूटा ताल वे ।
दह दिशि फूटा,
नीर निखूटा,
लेखा डेवण साल वे ।
दादू दास कहै,
बणिजारा,
तूँ रत्ता तरुणी नाल वे ॥ २ ॥

(प्रौढ अवस्था)

तीजे पहरे रैणि दे,
बणिजारिया,
तैं बहुत उठाया भार वे ।
जो मन भाया,
सो कर आया,
ना कुछ किया विचार वे ।
विचार न कीया
नाम न लीया,
क्यों कर लंघै पार वे ।
पार न पावे,
फिर पछितावे,
डूबण लग्गा धार वे ।
डूबण लग्गा,
भेरा भग्गा,
हाथ न आया सार वे ।
दादू दास कहै,
बणिजारा,
तैं बहुत उठाया भार वे ॥ ३ ॥

वृद्धावस्था जर्जरी भूत (वृद्धावस्था)

चौथे पहरे रैणि दे,
बणिजारिया,
तूँ पक्का हुआ पीर वे ।
जोबन गया,
जरा वियापी,
नांही सुधि शरीर वे ।
सुधि ना पाई,
रैणि गँवाई,
नैंनहुँ आया नीर वे ।
भव-जल भेरा डूबण लग्गा,
कोई न बंधै धीर वे ।
कोई धीर न बंधे जम के फंधे,
क्यों कर लंघे तीर वे ।
दादू दास कहै,
बणिजारा,
तूँ पक्का हुआ पीर वे ॥ ४ ॥

............................दादू साहेब

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