Sunday, 17 November 2013

काल और परमात्मा


मित्रों,
शायद हमे यह भेद नही समझ रहे है।
इसीलिए दुःख भोग रहे है।

चलती चाकी देख कर।
दिया कबीरा रोय।।
दोय पाटन के बिच में।
साबित बचा न कोय।।
(माया तथा ब्रह्म की भक्ति करने वाले काल के मुख में जाते है)

चलती चाकी देखकर।
गया कबिरा खिल।।
राखन हारा राखत है।
जो जाय किली से मिल।।
(परमात्मा की भक्ति करने वाले काल के मुख से बच जाते है)

............... कबीर साहेब

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