मुठी मुठी पिसता।
के मण आटा होय।।
टोपे टोपे सरभरे।
"हरिया" कुद्रत जोय।।
"हरिया" नामके संत कहते है...(पहले जमाने में आटा पिसने की चक्किया नही थी, महिलाये सुबह उठकर घरपर ही अनाज पिसती थी)
अगर किसी स्त्री के सामने बोरा भरके अनाज रख दिया और उसे पिसने को कहा तो वह असंभव सी बात होगी। लेकिन वही स्त्री रोज थोडा थोडा (मुठी-मुठी) अनाज पिसते पिसते जीवन भर में कई बोरे अनाज पिसती है। इसी प्रकार बूंद बूंद से सागर बनता है।
एसेही रोज एक प्रहार (3 घंटे) भजन अगर हम करते है तो एक साल में (1080 घंटे) 45 दिन मतलब डेढ़ महिना भजन होता है। दस साल में सवा साल भजन होता है। चालीस साल में पुरे पांच साल का भजन होता है। जो की किसी भी संसारी व्यक्ति को असंभव नही है। इसलिए रोज थोडा थोडा भजन करे तो वह हम सब के हित में ही है।
......आदि सतगुरु सुखराम जी महाराज ने ......धन्य हो। धन्य हो।। धन्य हो।।।
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