मित्रवर,
हमारे शारीर में कुल दस दरवाजे है।
जिसमे नऊ दरवाजे सभी के खुले है।
मृत्यु समय प्राण
इन्ही नऊ दरवाजे से निकलता है।
आँखों के दो।
कान के दो।
नाक के दो।
मुख का एक।
यह सात और....
मल तथा मूत्र ये दो।
कुल नऊ दरवाजे।
उपर के सात दरवाजे से जानेवाला जिव स्वर्गादिक देश में जाता है।
निचे के दो द्वार से जानेवाला जिव नर्कादिक में जाता है।
लेकिन जो सीर के शिखा की चोटी पर दसवा द्वार होता है। संत सतगुरु से भेद लेकर यह दसवाद्वार खोल कर हम आवागमन-जन्म मरण मिटा सकते है।
© सतस्वरुप आनंदपद ने:अन्छर निजनाम ग्रन्थ से....
शानू पंडित...पुणे.
हमारे शारीर में कुल दस दरवाजे है।
जिसमे नऊ दरवाजे सभी के खुले है।
मृत्यु समय प्राण
इन्ही नऊ दरवाजे से निकलता है।
आँखों के दो।
कान के दो।
नाक के दो।
मुख का एक।
यह सात और....
मल तथा मूत्र ये दो।
कुल नऊ दरवाजे।
उपर के सात दरवाजे से जानेवाला जिव स्वर्गादिक देश में जाता है।
निचे के दो द्वार से जानेवाला जिव नर्कादिक में जाता है।
लेकिन जो सीर के शिखा की चोटी पर दसवा द्वार होता है। संत सतगुरु से भेद लेकर यह दसवाद्वार खोल कर हम आवागमन-जन्म मरण मिटा सकते है।
© सतस्वरुप आनंदपद ने:अन्छर निजनाम ग्रन्थ से....
शानू पंडित...पुणे.
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