Monday, 24 March 2014

कहत कबीर

कहत कबीरा

कबीर कहता जात हूँ,
सुणता है सब कोइ।
राम कहें भला होइगा,
नहिं तर भला न होइ॥1॥

कबीर कहै मैं कथि गया,
कथि गया ब्रह्म महेस।
राम नाँव सतसार है,
सब काहू उपदेस॥2॥

तत तिलक तिहूँ लोक मैं,
राम नाँव निज सार।
जब कबीर मस्तक दिया
सोभा अधिक अपार॥3॥

भगति भजन हरि नाँव है,
दूजा दुक्ख अपार।
मनसा बचा क्रमनाँ,
कबीर सुमिरण सार॥4॥

कबीर सुमिरण सार है,
और सकल जंजाल।
आदि अंति सब सोधिया
दूजा देखौं काल॥5॥

चिंता तौ हरि नाँव की,
और न चिंता दास।
जे कछु चितवैं राम बिन,
सोइ काल कौ पास॥6॥

पंच सँगी पिव पिव करै,
छटा जू सुमिरे मन।
मेरा मन सुमिरै राम कूँ,
मेरा मन रामहिं आहि॥7॥

मेरा मन सुमिरै राम कूँ,
मेरा मन रामहिं आहि।
अब मन रामहिं ह्नै रह्या,
सीस नवावौं काहि॥8॥

तूँ तूँ करता तूँ भया,
मुझ मैं रही न हूँ।
वारी फेरी बलि गई,
जित देखौं तित तूँ॥9॥

कबीर निरभै राम जपि,
जब लग दीवै बाति।
तेल घट्या बाती बुझी,
(तब) सोवैगा दिन राति॥10॥

कबीर सूता क्या करै,
जागि न जपै मुरारि।
एक दिनाँ भी सोवणाँ,
लंबे पाँव पसारि॥11॥

कबीर सूता क्या करै,
काहे न देखै जागि।
जाका संग तैं बीछुड़ा,
ताही के संग लागि॥12॥

कबीर सूता क्या करै
उठि न रोवै दुक्ख।
जाका बासा गोर मैं,
सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥13॥

कबीर सूता क्या करै,
गुण गोबिंद के गाइ।
तेरे सिर परि जम खड़ा,
खरच कदे का खाइ॥14॥

कबीर सूता क्या करै,
सुताँ होइ अकाज।
ब्रह्मा का आसण खिस्या,
सुणत कालको गाज॥15॥

केसो कहि कहि कूकिये,
नाँ सोइयै असरार।
राति दिवस के कूकणौ,
(मत) कबहूँ लगै पुकार॥16॥

जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस,
फुनि रसना नहीं राम।
ते नर इस संसार में,
उपजि षये बेकाम॥17॥

कबीर प्रेम न चाषिया,
चषि न लीया साव।
सूने घर का पाहुणाँ,
ज्यूँ आया त्यूँ जाव॥18॥

पहली बुरा कमाइ करि,
बाँधी विष की पोट।
कोटि करम फिल पलक मैं,
(जब) आया हरि की वोट॥19॥

कोटि क्रम पेलै पलक मैं,
जे रंचक आवै नाउँ।
अनेक जुग जे पुन्नि करै,
नहीं राम बिन ठाउँ॥20॥

जिहि हरि जैसा जाणियाँ,
तिन कूँ तैसा लाभ।
ओसों प्यास न भाजई,
जब लग धसै न आभ॥21॥

राम पियारा छाड़ि करि,
करै आन का जाप।
बेस्वाँ केरा पूत ज्यूँ,
कहे कौन सूँ बाप॥22॥

कबीर आपण राम कहि,
औरां राम कहाइ।
जिहि मुखि राम न ऊचरे,
तिहि मुख फेरि कहाइ॥23॥

जैसे माया मन रमै,
यूँ जे राम रमाइ।
(तौ) तारा मण्डल छाँड़ि करि,
जहाँ केसो तहाँ जाइ॥24॥

लूटि सकै तो लूटियो,
राम नाम है लूटि।
पीछै ही पछिताहुगे,
यहु तन जैहै छूटि॥25॥

लूटि सकै तो लूटियो,
राम नाम भण्डार।
काल कंठ तै गहैगा,
रूंधे दसूँ दुवार॥26॥

लम्बा मारग दूरि घर,
विकट पंथ बहु मार।
कहौ संतो क्यूँ पाइये,
दुर्लभ हरिदीदार॥27॥

गुण गाये गुण ना कटै,
रटै न राम बियोग।
अह निसि हरि ध्यावै नहीं,
क्यूँ पावै दुरलभजोग॥28॥

कबीर कठिनाई खरी,
सुमिरतां हरि नाम।
सूली ऊपरि नट विद्या,
गिरूँ तं नाहीं ठाम॥29॥

कबीर राम ध्याइ लै,
जिभ्या सौं करि मंत।
हरि साग जिनि बीसरै,
छीलर देखि अनंत॥30॥

कबीर राम रिझाइ लै,
मुखि अमृत गुण गाइ।
फूटा नग ज्यूँ जोड़ि मन,
संधे संधि मिलाइ॥31॥

कबीर चित्त चमंकिया,
चहुँ दिस लागी लाइ।
हरि सुमिरण हाथूं घड़ा,
बेगे लेहु बुझाइ॥32॥

.......................... कबीरा

Sunday, 23 March 2014

एको दोष विनाश

मृग-मीन-भृंग-पतंग-कुंजर।
एको दोष विनाश।।
पञ्च दोष असाधता।
ता की केतिक आस।।

मृग=हिरण

मीन=मछली

भृंग=भँवरा

पतंग=पतंगा

कुञ्जर=हाथी

..................एको दोष विनाश

इन प्राणियों
में एक एक दोष
होने की वजह से
इनका प्राण जाता है।

ये काल के भक्ष बन जाते है।

जैसे...

मृग=हिरण-(कर्ण सुख)

मीन=मछली-(जिव्हा सुख)

भृंग=भँवरा-(नासिका सुख)

पतंग=पतंगा-(दृष्टी सुख)

कुञ्जर=हाथी-(स्पर्श सुख)

...........अगर
एक एक दोष से
इनके प्राण जाते है...तो..

हममे पांचो दोष है...
तो हमारी क्या स्थिति होगी ?

यह सोचो.....

अवस्था - दादू साहेब

(बाल्यावस्था)

पहले पहरे रैणि दे,
बणिजारिया,
तूँ आया इहि संसार वे ।
मायादा रस पीवण लग्गा,
बिसार्या सिरजनहार वे ।
सिरजनहार बिसारा किया पसारा,
मात पिता कुल नार वे ।
झूठी माया आप बँधाया,
चेतै नहीं गँवार वे ।
दादू दास कहै,
बणिजारा,
तूँ आया इहि संसार वे ॥ १ ॥

(तरुण अवस्था)

दूजे पहरै रैणि दे,
बणिजारिया,
तूँ रत्ता तरुणी नाल वे ।
माया मोह फिरै मतवाला,
राम न सक्या संभाल वे ।
राम न संभाले,
रत्ता नाले,
अंध न सूझै काल वे ।
हरि नहीं ध्याया,
जन्म गँवाया,
दह दिशि फूटा ताल वे ।
दह दिशि फूटा,
नीर निखूटा,
लेखा डेवण साल वे ।
दादू दास कहै,
बणिजारा,
तूँ रत्ता तरुणी नाल वे ॥ २ ॥

(प्रौढ अवस्था)

तीजे पहरे रैणि दे,
बणिजारिया,
तैं बहुत उठाया भार वे ।
जो मन भाया,
सो कर आया,
ना कुछ किया विचार वे ।
विचार न कीया
नाम न लीया,
क्यों कर लंघै पार वे ।
पार न पावे,
फिर पछितावे,
डूबण लग्गा धार वे ।
डूबण लग्गा,
भेरा भग्गा,
हाथ न आया सार वे ।
दादू दास कहै,
बणिजारा,
तैं बहुत उठाया भार वे ॥ ३ ॥

वृद्धावस्था जर्जरी भूत (वृद्धावस्था)

चौथे पहरे रैणि दे,
बणिजारिया,
तूँ पक्का हुआ पीर वे ।
जोबन गया,
जरा वियापी,
नांही सुधि शरीर वे ।
सुधि ना पाई,
रैणि गँवाई,
नैंनहुँ आया नीर वे ।
भव-जल भेरा डूबण लग्गा,
कोई न बंधै धीर वे ।
कोई धीर न बंधे जम के फंधे,
क्यों कर लंघे तीर वे ।
दादू दास कहै,
बणिजारा,
तूँ पक्का हुआ पीर वे ॥ ४ ॥

............................दादू साहेब

संत महिमा

विधि-हरि-हर-कवि-कोविद-वाणी।।
कहत साधू महिमा सिकुचानी।।
ओ मोसन कही जात न कैसे।।
शाक-वनिक-मुनि-गुनी-जन जैसे।।

विधि=ब्रह्मा,

हरि=विष्णू,

हर=महादेव,

कवि=कवि,

कोविद=पंडित,

वाणी=सरस्वती,

ये भी
साधू संतो की महिमा
करने में संकोचते है।

मै
साधारण सामान्य व्यक्ति
ऐसे महान साधू-संतो के गुण
किस प्रकार से गाऊ ?
वर्णन करु ?

कुछ प्रश्न ....


प्रश्न-
पवन बिना दो शब्द कौनसे ?

पवन बिना शब्द है दोई।
सात पुरुष बिन पाणी।।
के सुखराम परमपद यासु।
पेला परे पिछाणी।।

प्रश्न- गांगरी और न्यारी करसु शायके का मतलब समझाओ ?

जल में डारी गांगरी।
तुरत गले नही काय।।
न्यारी करसु शायके।
फिर फिर लेत उठाय।।

प्रश्न- शारीर छूटने पर प्राण किन किन दिशा से कहाँ कहाँ जाता है ?

।।आदि सतगुरु सुखराम जी महाराज ने धिन्न हो।।

Friday, 21 March 2014

यह कालमुक्ति क्या है ?

सतलोक की सकल सुनावां,
वाणी हमरी अखवै ||

नौ लख पटटन ऊपर खेलूं,
साहदरे कूं रोकूं |
व्दाजस कोटि कटक सब काटूं,
हंस पठाऊ मोखूं ||

चौदह भुवन गमन है मेरा,
जल थल में सरबंगी |
खालिक खलक खलक में खालिक,
अविगत अचल अभंगी ||

अगर अलील चकर है मेरा,
जित से हम चल आए |
पांचों पर परवाना मेरा,
काल छुटावन धाये ||

जहाँ ओंकार निरंजन नाही,
बरह्मा विष्णु वेद नाही जाही |
जहाँ करता नहीं जान भगवाना,
काया माया पिण्ड न जिवा ||

पाँच तत्व तीनों गुण नाही,
जोरा काल दीप नहीं जाहीं |
अमर करूं सतलोक पठाँऊ,
तातै कालमुक्ती कहाऊँ ||

                           ।।कबीर साहेब।।
                             राम राम सा………

मिशन सतस्वरुप किसने और कब शुरू किया ?

⊙मिशन सतस्वरुप⊙

प्रश्न- यह मिशन सतस्वरुप किसने और कब शुरू किया है ?

यह मिशन सतस्वरुप आदि सतगुरू, सर्व आत्माओंके सतगुरु,सर्व श्रृष्टि के सतगुरु, सतगुरु सुखरामजी महाराज ने इस श्रृष्टि की रचना हुयी तबसे शुरू किया।

          आदिसे (जबसे सृष्टी निर्माण हुई)है। ब्रम्हा, विष्णू, महादेव, शक्ती, शेष सब  सतस्वरुप परमात्मा का आधार लेके इस सृष्टी मे अपना अपना कार्य पूरा कर रहे है।
उन्होंने फैलाया हुआ माया जाल छेद कर जिवोको हंसो को अमर लोक (सतस्वरुप आनंद्पद) में ले जाने के लिए आदि श्रृष्टि रचना से लेकर आज तक हर युगमे 'आदि सतगुरू जी महाराज साहेब' आते है।
यह सतस्वरुप का विज्ञान जिवोंतक पहुचाते है। उन्हे भवसागरसे निकालकर अमरलोकमे लेके जाते है।

      ऎसेही इस कलजुग मे  "आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज "राजस्थान मे (भरतखंडमे) 'जोधपुर' जिलामे बिराही' गावमे ब्राम्हण कुलमे सन १८७३ मे आये।
आदि सतगुरू महाराज गर्भवास मे नही आये बल्की "सुखराम" नामके बालक के देहमे (जब बालक का शारीर छुट गया तो) सतस्वरुप (अमरलोक) आनंद्पद से आकर प्रवेश किया तब उस सुखराम नाम के बालक के  देह में चेतनता आ गयी।
पश्चात् आदि सतगुरु महाराज ने अखंडीत रुप से अठरा साल तक एक पत्थरपर बैठकर सतस्वरुप परमात्मा  की भक्ती (रामनाम का भेदसहित सुमिरण) की और घट में ही ने:अन्छर की प्राप्ति करके नब्बे साल तक रहकर सव्वा लक्ष जीवोंको परम मोक्ष मे लेके गये।
अभी भी उनका सत्ता रुपसे कार्य शुरु है इसकी अनुभूति आप स्वयं श्वास उश्वास में भजन करके अपने शरीर में ही ले सकते हो। आपको तिलभर भी इधर उधर खोजना नही है।

©
॥ राम राम सा॥
।। सतस्वरुप-आनंद्पद-ने:अन्छर-निजनाम ग्रन्थ से।।