Sunday, 11 May 2014

थे किशा राम ने गावो ?

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
।। सतस्वरुपी राम।।

एक बार आदि सतगुरु जी महाराज से किसीने प्रश्न किया

प्रश्न - थे किश्या "राम" ने गावो ?

उत्तर - आदि सतगुरु जी महाराज ने जबाब दिया जो उन्हीके शब्दोमे -

पांच जिण तत्त बेराट वो थरपियो।।
विष्णु ब्रह्मा हर पैदास किया।।
पीर और शिव शक्त के उपरे।।
दूज कु ज्ञान का मूल दिया।।
अलख आलेख अल्लाय खुदाय सो।।
काल हुणहार उण राम सारे।।
पलक में मांड नर नार से थरपियो।।
छीनक में सबकु मार डारे।।
कागदा उपरे राम मंडे नही।।
मुख में जीभ पर नाय आवे।।
दास सुखराम ब्रह्म ने रट रह्या।।
संत कोई सुरवा भेद पावे।।
रमता राम सु हेत हम बांधीयो।।
बोलता राम सु प्रीत किन्ही।।
देह आकार का नाम सब परहऱ्या।।
अरध उरध बिच सुरत दीन्ही।।
पांच पच्चीस सु राम न्यारा रहे।।
दिष्ट और मुष्ट में नाय आवे।।
धरण पाताल अस्मान सु अगम है।।
क्रोडा मज संत कोई गम पावे।।
पूरण राम भरपूर सो भर रह्या।।
जाय ब्रह्मंड ररंकार ध्याऊ।।
दास सुखराम शब्द अरूप है।।
जिंग सी धुन सु राम गाऊ।।

नही बाप अर माय।
नही बेनर सुन भैय्या।।
नही देश कुल गाव।
नही किन सरणन रैय्या।।
नही ज्ञान गुरु शीश।
नही आपो तन काया।।
नही वार कछु पार।
नही कहूँ जायर आया।।
ऐसा अद्भुत "राम" है।
जा कु सिवरुं बीर।।
ताकू सुन "सुखराम" कहें।
भजियो दास कबीर।।

।। राम राम सा।।
।। आदि सतगुरुजी महाराज साहेब।।

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Saturday, 3 May 2014

।। भक्ति का फल।।

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
।। फलफूल।।

प्रश्न - भक्ति और उसका फल .........विस्तृत कीजिए

उत्तर - आदि सतगुरु, सर्व आत्मओंके सतगुरु,सर्व श्रृष्टि के सतगुरु, सतगुरु सुखराम जी महाराज ने सभी भक्तिओंके फल विस्तृत से अलग अलग बताये है।

तपश्चर्या का फल - राजा बनोगे।
तीर्थस्नान का फल - रूपवान काया मिलेगी।
व्रत करोगे - निरोगी काया मिलेगी।
देवी की भक्ति करोगे - स्त्री जन्म मिलेगा।
ब्रह्मा की भक्ति / गायत्री मन्त्र - ब्रह्मा के सतलोक में जाओगे।
एक सौ एक यज्ञ करोगे - इंद्र पदवी पाओगे।
विष्णु / नवधा भक्ति - वैकुण्ठ प्राप्ति
शिव की भक्ति करोगे - कैलास में जाओगे।
शक्ति की भक्ति - शक्ति लोक
क्षेत्रपाल/भेरू/भोपा - यमदूत
नीच कर्म - नर्क में जाओगे।
सोऽहं जाप अजप्पा - पारब्रह्म (होनकाल)

उपरोक्त सभी फल तुरंत नही मिलते। इस जन्म में यह भक्ति करोगे तो मृत्यु पश्चात 43,20,000 साल चौरासी लाख योनी भटकानेके बाद अगले जन्म में यह फल मिलता है।
यह भक्तियाँ करनेके पश्चात आवागमन (जन्म-मरण) नही मिटाता।

जन्म-मरण (आवागमन) मिटाना है तो आदि सतगुरु, सर्व आत्मओंके सतगुरु,सर्व श्रृष्टि के सतगुरु, सतगुरु सुखराम जी महाराज का सतस्वरुप विज्ञान धारण करके उनका शरणा लेकर श्वास उश्वास में सतस्वरुपी "राम" नाम का सुमिरन करके अपने शारीर मे बारह कमलोंका छेदन करके बंकनाल (पश्चिम) के रस्ते से दसवाँ द्वार खोलकर पारब्रह्म के परे सतस्वरुप आनंदपद - अमरलोक में जाना होगा वह भी जीवित अवस्था में।
मृत्यु पश्चात नही जीवित अवस्था में।

।। फलफूल के अंग से।।
।। आदि सतगुरुजी महाराज साहेब।।
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Thursday, 1 May 2014

अष्ट प्रहर

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
   ।। प्रश्न-उत्तर।।

प्रश्न- प्रहर क्या है ?
........कितने है ?

उत्तर- 'प्रहर' समय गिनती का एक प्रमाण है। तिन घंटे के समय को प्रहर (पोहोर) कहते है। कुल अष्टप्रहर है।

मै इस भक्ति में नया था तो अनेक संतो के साथ ज्ञान बटोरने हेतु बैठक जमा लेता था तब एक बार जीग्यसुराम जी महाराज (बन बाबा-रहाड़ी बाबा) ने यह कहावत बताई थी। सुनकर बड़ा मजा आया था और दिमाग में सटीक बैठ गयी।

उनकी समझाने की एक अलग शैली थी। वे ज्ञानचर्चा के समय कहावते मुहावरे इनका प्रयोग जादा करते थे।
तो उन्होंने एक बार चर्चा में कह दिया।

पहले पोहोर 'हर कोई' जागे।
दुसरे पोहोर 'भोगी'।।
तीसरे प्रहर 'चोर' जागे।
चौथे पोहोर 'योगी'।।

फिर उन्होंने समझाया प्रहर आठ होते है। दिन के चार और रात के चार। इन्हे अष्ट प्रहर (आठ पोहोर) कहते है।
अब रहाडी बाबा ने यह बात रात के प्रहर की बताई थी क्योंकि चर्चा का समय रात का था। 

पहले प्रहर हर कोई जागे। शाम - 6 से 9
दुसरे प्रहर भोगी।
रात - 9 से 12
तीसरे प्रहर चोर जागे।
मध्यरात्री - 12 से 3
चौथे प्रहर योगी।
सुबह - 3 से 6

(योगी पुरुष इस चौथे प्रहर को पहला प्रहर भी कहते है)

इस प्रकार से अष्टप्रहर है।

उपरोक्त रात के चार प्रहर और निम्न दिन के चार......

पहला प्रहर - सुबह - 6 से 9
दूसरा प्रहर- सुबह - 9 से 12
तीसरा प्रहर -दोपहर 12 से 3
चौथा प्रहर - दोपहर -3 से 6

।। राम राम सा।।
।। आदि सतगुरुजी महाराज साहेब।।

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Wednesday, 16 April 2014

◑ भक्तियोग ◐

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
   ।। सुखविलास।।

सूरत शब्द बिजोग।
मन पवना न्यारा रहे।।
ये चारू मिलन संजोग।
'भक्तियोग' याते कहें।।

सूरत शब्द सु मेल।
मन पवना दोनु गहें।।
तो लिव लागे जिण बार।
आठ प्रहर इमरत चवे।।

आदि सतगुरुजी महाराज साहेब कहते है...
मेरे शब्द और सूरत का वियोग होता था। सुरत और शब्द अलग अलग रहते थे। मन और श्वास भी अलग अलग रहते थे।
सुरत-शब्द-मन और श्वास ये चारो एक जगह मिलते है उसे 'भक्तियोग' कहते है।
सुरत का शब्द से मेल होकर मन और श्वास इन दोनों को पकड़ लेता है। ऐसे चारो मिलने का संयोग होता है उसे 'भक्तियोग' कहते है। 'सतस्वरुपी राम' नाम से जब लव लगेगी आठो प्रहर अमृत टपकने लगेगा।
ऐसा आदि सतगुरुजी महाराज साहेब कहते है।

।। राम राम सा।।
।। आदि सतगुरुजी महाराज साहेब।।

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सुख विलास ◑साझन◐

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
   ।। सुखविलास।।

मारग माहि देखकर।
पाया सुखविलास।।
ओ साझन 'सुखराम' कहें।
सिंवरो साँस उसांस।।

सूरत शिखर में रम रही।
ररंकार सु बात।।
ओ समियो 'सुखराम' कहें।
जन्म मरण लग साथ।।

आदि सतगुरुजी महाराज साहेब कहते है की....मेरी सूरत शिखर में रमण कर रही है और ररंकार से बात कर रही है। ऐसा समय मेरे जन्म से मरने तक रहेगा और परममोक्ष के रास्ते में मैंने यह सारा 'सुख विलास' देखा और यह सब मुझे इसलिए मिला क्योंकि मैंने श्वास उश्वास में 'सतस्वरुपी राम' नाम का सुमिरन किया। इस समूचे विश्व में 'जीवित अवस्था में परममोक्ष' का यही एकमात्र साधन है और इस सृष्टि अन्य कोई साधन नहीं है।

।। राम राम सा।।
।। आदि सतगुरुजी महाराज साहेब।।

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सतगुरु परख

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⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
   ।। सतगुरु पारख।।

ब्रह्मा रचिया सृजन कु।
विष्णु करन प्रतिपाल।।
शिव रच्या संहार कु।
इंद्र बरसन मेघ माल।।
पाप पूण्य का न्याव कु।
सिरजो हे जमराज।।
संत सिरज्या "सुखराम" कहें।
जिव उधारण काज।।

आदि सतगुरुजी महाराज साहेब कहते है... ब्रह्मा का सृजन (निर्माण) सृष्टि निर्मिती के लिए है। विष्णु पालन करने हेतु तथा इंद्र वर्षा करने हेतु और यमराज पाप पुण्य का न्याय करने हेतु निर्माण किये गए है। उसी प्रकार "सतस्वरुपी संत" जिव के उद्धार के लिए ही निर्माण किये गए है।

।। राम राम सा।।
।। आदि सतगुरुजी महाराज साहेब।।

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