Friday, 21 March 2014

यह कालमुक्ति क्या है ?

सतलोक की सकल सुनावां,
वाणी हमरी अखवै ||

नौ लख पटटन ऊपर खेलूं,
साहदरे कूं रोकूं |
व्दाजस कोटि कटक सब काटूं,
हंस पठाऊ मोखूं ||

चौदह भुवन गमन है मेरा,
जल थल में सरबंगी |
खालिक खलक खलक में खालिक,
अविगत अचल अभंगी ||

अगर अलील चकर है मेरा,
जित से हम चल आए |
पांचों पर परवाना मेरा,
काल छुटावन धाये ||

जहाँ ओंकार निरंजन नाही,
बरह्मा विष्णु वेद नाही जाही |
जहाँ करता नहीं जान भगवाना,
काया माया पिण्ड न जिवा ||

पाँच तत्व तीनों गुण नाही,
जोरा काल दीप नहीं जाहीं |
अमर करूं सतलोक पठाँऊ,
तातै कालमुक्ती कहाऊँ ||

                           ।।कबीर साहेब।।
                             राम राम सा………

मिशन सतस्वरुप किसने और कब शुरू किया ?

⊙मिशन सतस्वरुप⊙

प्रश्न- यह मिशन सतस्वरुप किसने और कब शुरू किया है ?

यह मिशन सतस्वरुप आदि सतगुरू, सर्व आत्माओंके सतगुरु,सर्व श्रृष्टि के सतगुरु, सतगुरु सुखरामजी महाराज ने इस श्रृष्टि की रचना हुयी तबसे शुरू किया।

          आदिसे (जबसे सृष्टी निर्माण हुई)है। ब्रम्हा, विष्णू, महादेव, शक्ती, शेष सब  सतस्वरुप परमात्मा का आधार लेके इस सृष्टी मे अपना अपना कार्य पूरा कर रहे है।
उन्होंने फैलाया हुआ माया जाल छेद कर जिवोको हंसो को अमर लोक (सतस्वरुप आनंद्पद) में ले जाने के लिए आदि श्रृष्टि रचना से लेकर आज तक हर युगमे 'आदि सतगुरू जी महाराज साहेब' आते है।
यह सतस्वरुप का विज्ञान जिवोंतक पहुचाते है। उन्हे भवसागरसे निकालकर अमरलोकमे लेके जाते है।

      ऎसेही इस कलजुग मे  "आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज "राजस्थान मे (भरतखंडमे) 'जोधपुर' जिलामे बिराही' गावमे ब्राम्हण कुलमे सन १८७३ मे आये।
आदि सतगुरू महाराज गर्भवास मे नही आये बल्की "सुखराम" नामके बालक के देहमे (जब बालक का शारीर छुट गया तो) सतस्वरुप (अमरलोक) आनंद्पद से आकर प्रवेश किया तब उस सुखराम नाम के बालक के  देह में चेतनता आ गयी।
पश्चात् आदि सतगुरु महाराज ने अखंडीत रुप से अठरा साल तक एक पत्थरपर बैठकर सतस्वरुप परमात्मा  की भक्ती (रामनाम का भेदसहित सुमिरण) की और घट में ही ने:अन्छर की प्राप्ति करके नब्बे साल तक रहकर सव्वा लक्ष जीवोंको परम मोक्ष मे लेके गये।
अभी भी उनका सत्ता रुपसे कार्य शुरु है इसकी अनुभूति आप स्वयं श्वास उश्वास में भजन करके अपने शरीर में ही ले सकते हो। आपको तिलभर भी इधर उधर खोजना नही है।

©
॥ राम राम सा॥
।। सतस्वरुप-आनंद्पद-ने:अन्छर-निजनाम ग्रन्थ से।।

Thursday, 27 February 2014

शिव के अमर होने का भेद क्या है ?

⊙मिशन सतस्वरुप⊙
 ।। सतस्वरुपी राम।।

।। भ्रम विध्वंस।।

उमा अर्ज करे शिवजी सु।
सुन लो मेरी पुकारा।।
मै परलय तुम जूण अजूणी।
जाको कहाँ विचारा ।।

………………… उमा (पार्वती) शिव से प्रश्न करती है... हे शिवजी मेरी बिनती सुनो और मेरे प्रश्न का उत्तर दो की मै बार बार प्रलय (शारीर छूटना) मे पड़ रही हूँ और आप जैसे के वैसे (अमर) कैसे हो ?

सत्य वचन सुन सुन्दर वदनी।
मेरो राम आधारा।।
र रं-कार सु प्रित लगाओ।
सब सारन में सारा।।

………………… शिव पार्वती से कहते है.... हे प्रिये, हे सुन्दर वदनी मै "सतस्वरुपी राम" नाम की वजह से अमर हुआ हूँ। इसलिए तुम भी र रं-कार से प्रित लगाओ और अमर हो जाओ। यह "सतस्वरुपी" "राम" नाम ही सत्य है। यही सार रूपी शब्द है जो मै कैलास में बैठकर इसका रातदिन सुमिरन कर रहा हूँ।

एता दिन मोय क्यों न बतायो ?
एसो छाने काय छिपाओ ?

…………………फिर पार्वती पूछती है... इतने दिन आपने मुझे क्यों नहीं बताया ? इतनी अच्छी बात मुझसे क्यों छिपाई ?

उत्तम पुरुष लक्षण कहूँ तोई।
बुझ्या बिना न कहे है कोई।।
अब देवी "निजनाम" बताऊ।
तेरो जामण मरण मिटाऊ।।
सेंसर नाम में येई सारा।
देवी भजो "राम" र रं-कारा।।

…………………शिवजी ने कहा... अरे, यही तो उत्तम पुरुष का लक्षण है। जब तक कोई पूछे नही तब तक उसे बतावे नहीं। तुमने आजतक पूछा नही मैंने बताया नही। अब तुमने पूछ लिया तो बताता हूँ .... हे देवी, मै तुझे "निजनाम" (सतनाम-उस परमपिता परमात्मा का नाम) बताता हूँ जिसके सुमिरन से आवागमन-जन्ममरण मिट जाता है। सहस्त्र नामोमे वही बस एक सार रूपी शब्द है और वह है "सतस्वरुपी राम" नाम इसलिए हे देवी तुम भी आज से यह "राम" नाम का सुमिरन करो और "पुनरपि जन्मम पुनरपि मरणम, पुनरपि जननी जठरे शयनं" जन्म मरण रहीत निर्भय निश्चल हो जाओ। इस सगुण निर्गुण लोक को हमेशा के लिए छोड़कर अमर लोक में अनंत युगोतक अनंत अमर सुख भोगो।

अगर आपको भी अपना जन्म मरण मिटाना हो तो आपभी यह सतस्वरुपी "राम" नाम आती जाती श्वास में जपना शुरू करो।

अधिक जानकारी
हेतु संपर्क-

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मिशन सतस्वरुप- पुणे
09765282928
09423492193

मिशन सतस्वरुप की जरुरत क्यों है ?

⊙मिशन सतस्वरुप⊙
 ।। सतस्वरुपी राम।।

प्रश्न- मिशन सतस्वरुप की जरुरत क्यों है ?

इस जगत में अनेक प्रकार के दुखी कष्टी जिव-प्राणिमात्र है जो इस संसारी मोहमाया के जाल से उब गए है। इससे वे छुटकारा पाना चाहते है लेकिन उन्हें इस माहोल से निकालने वाला कोई दिखाई नहीं देता। इसलिए वे दरबदर भटक रहे है। ऐसे सभी दीन-दुर्बल, दुखीः कष्टी, हाताश-निर्बल, सगुण-निर्गुण भक्ति करके भी असंतुष्ट, काल से भयभयित, यम की फासी छुड़ाकर केवल एक परमात्मा को माननेवाले, आपने अंदर ही परमात्मा की खोज करनेवाले, अनंत सुखोकी चाहना रखने वाले, अमर आत्मा को अमर सतस्वरुप परमात्मा से मिलानेकी चाहना रखनेवाले, जीवित अवस्था में परममोक्ष की प्राप्ति चाहने वाले, अपना आवागमन फिरसे चौरासी का दुःख न भोगने की इच्छा रखनेवाले, गर्भ की त्रासदी मिटाने की इच्छा रखने वाले मृत्यु लोक को हमेशा के लिए छोड़कर अमर लोक में जानेकी इच्छा रखनेवाले अनंत युगोतक अनंत अमर सुख पानेकी इच्छा रखनेवाले सभी अबालवृध्द के लिए यह "मिशन सतस्वरुप" की जरुरत है।

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मिशन सतस्वरुप किसके लिए है ?

⊙मिशन सतस्वरुप⊙
 ।। सतस्वरुपी राम।।

प्रश्न- मिशन सतस्वरुप किसके लिए है ?

इस जगत में जो दीन-दुर्बल, दुखीः कष्टी, हाताश-निर्बल, सगुण-निर्गुण भक्ति करके भी असंतुष्ट, काल से भयभयित, यम की फासी छुड़ाकर केवल एक परमात्मा को माननेवाले, आपने अंदर ही परमात्मा की खोज करनेवाले, अनंत सुखोकी चाहना रखने वाले, अमर आत्मा को अमर सतस्वरुप परमात्मा से मिलानेकी चाहना रखनेवाले, जीवित अवस्था में परममोक्ष की प्राप्ति चाहने वाले, अपना आवागमन फिरसे चौरासी का दुःख न भोगने की इच्छा रखनेवाले, गर्भ की त्रासदी मिटाने की इच्छा रखने वाले मृत्यु लोक को हमेशा के लिए छोड़कर अमर लोक में जानेकी इच्छा रखनेवाले अनंत युगोतक अनंत अमर सुख पानेकी इच्छा रखनेवाले सभी अबालवृध्द के लिए यह "मिशन सतस्वरुप" है।

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Sunday, 16 February 2014

मिशन सतस्वरुप.....क्या है ?

⊙मिशन सतस्वरुप⊙
 ।। सतस्वरुपी राम।।

प्रश्न- मिशन सतस्वरुप क्या है ?

मिशन-उद्धेश्य-धेय्य
सतस्वरुप -
जो कल भी था, जो आज भी है और जो कल भी रहेगा।
जिसका त्रिकाल (तीनो काल-भूतकाल-वर्तमान काल-भविष्यकाल) में अभाव नही।
जो कभी नही था-ऐसा समय नही था।
जो कभी नही है-ऐसा समय नही है।
जो कभी नही रहेगा-ऐसा समय नही रहेगा।
ऐसा सत्त परमात्मा जो असत-नासत(नष्ट होनेवाला) नही है-जिसने सभी को निर्माण किया लेकिन उसे किसीने निर्माण नहीं किया। जो आदि-अनादी से है और जिसका अंत कभी भी नही होगा अंतत वही रहेगा।
जो दृष्टी में, मुष्टि में नही आता।
जो सभी में अणु-रेणू मे, कण कण में, रोम रोम में विराजमान है।
जो संपूर्ण श्रृष्टि में विराजमान है।
जिसका वार पार नही आता ऐसा सतस्वरुप-परमात्मा।
उसे मनुष्यदेह में प्राप्त करना।
यही मिशन सतस्वरुप है।

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Wednesday, 8 January 2014

८४,००,००० योनि.......


।। राम राम सा।।

पीछे मैंने सभीसे दो बार एक सवाल किया था चौरासी लाख योनिया कौनसी ?
इसका कारण यह था की - 20 साल से मै यह भक्ति कर रहा हूँ लेकिन मेरा यह प्रश्न प्रश्न ही बना हुआ है। मै जवाब चाहता था।
दोनों ग्रुप में से सिर्फ दो ही रामस्नेहियोंने उत्सुकता दर्शायी....उनको धन्यवाद..
अन्य ज्ञान में मुझे इसका उत्तर मिला वह निम्नलिखित है...
नव लख जल को जंतू है।
दस लख पक्षी जान।।
एकादश किट भृंग है।
स्थावर बीस बखान।।
तिस लाख पशु योनि है।
चतुलक्ष नर होय।।
सत्यासत्य विचार करे।
सांचा नर है सोय।।
इसका मतलब-
09 लाख- जलचर
10 लाख- पक्षी
20 लाख-स्थावर
11 लाख- कृमि
30 लाख- पशु
04 लाख- मनुष्य
_____________
84 लाख- कुल
इसकी पुष्टि "मन की राड" में यहाँ मिलती है....
किट पतंगा पशु पंखेरू।
लाख इक्यावन कहिया।।
एती देह ते धारी।
जहाँ तहाँ विषे रस पिया।। 81।।
मानव देह धरी ते केती।
लेखे बिना अपारा।।
चार लाख तू जूण कहानो।
जन्मा वार न पारा।।82।।
.................( मन की राड )

इसमे मुझे प्रश्न यह उठा की 4 लाख मनुष्य योनि कैसे ?
इसका मतलब 4 लाख बार हम मनुष्य योनि में आते है क्या ?
इधर हम कहते है की 43,20,000 साल के बाद एक बार नरदेह मिलता है। वह भी 100 साल के लिए।
क्या यह मेरा प्रश्न कोई सुलझाएगा क्या ?

......आदि सतगुरु सुखराम जी महाराज ने ......धन्य हो। धन्य हो।। धन्य हो।।।

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