Wednesday, 3 September 2014

कामी कुत्ता

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
***।। राम राम सा।।***

'कामी कुत्ता' तिस दिन।
अंतर रहे उदास।।
'कामी नर' कुत्ता सदा।
छह ऋतू बारह मास।।
......................।। कबीर साहब।।

'कामी कुत्ता'
तिस दिन मतलब एक माह एक ऋतू उसमे 'काम वासना' जागृत होकर वह उस काम में व्यस्त हो जाता है।
लेकिन...
'कामी नर' सदा के लिए कामवासना हृदय में लिए 'कुत्ते की तरह' जीभ से लार टपकाए बारह महीने 'काम वासना' के पीछे पडा हुआ रहता है।

.........................रामस्नेही शानुभाई
09423492193
09765282928

।। राम राम सा।।
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"गणेश" प्रथम पूजनीय कैसे ?

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙

प्रश्न- "गणेश" प्रथम पूजनीय कैसे ?

महिमा जाणी ज्यासी गणराऊ।
प्रथम पूजियत 'नाम' प्रभाऊ।।

गणपति प्रथम पूजनीय बने इसका कारण है की उन्होंने "सतस्वरुपी " राम " नाम" की महिमा जानी और प्रथम पूजनीय बने।

आदि सतगुरु सुखराम जी महाराज अपने "भुरकी ग्रन्थ" साखि ।।४०।। में भी कहते है.....

भुरकी गजानंद सुन पाई।
कुण बडपण गण ओली।।
पचासक्रोड़ पृथ्वी प्रदक्षिणा।
उभे अंक ए दो ली।।

सभी देविदेवताओं मे जब प्रथम पूजनीय कौन ? इस बात की चर्चा चली तो यह निर्णय हुआ की इस पचासक्रोड़ पृथ्वी को प्रदक्षिणा करके जो प्रथम हरिपुर में पहुंचेगा वह प्रथम पूजनीय माना जायेगा। जब पृथ्वी प्रदक्षिणा की दौड़ चली तो सभी देवी देवता अपने अपने वाहन पर बैठकर पृथ्वी प्रदक्षिणा के लिए निकल पड़े।
विष्णु अपने गरुड पर, ब्रह्मा अपने हंस पर, शिव अपने नंदी पर, इंद्रदेव अपने एरावत पर, हर कोई अपने अपने वाहन पर निकले।
"गणेश" भी अपने चूहें पर निकल पड़े...तो रास्ते में त्रिलोक की सफर करने वाले "देवर्षि नारद" मिले। अनायास ही बातचित के दौरान पृथ्वी प्रदक्षिणा की बात निकली तो "देवर्षि नारद" ने कहाँ सभी देवताओं के गतिमान वाहनों के मुकाबले आपके भारीभरकम शरीर के साथ आपका वाहन कैसे मुकाबला कर पायेगा ?
तो गणेशजी ने उनसे पूछा की ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए ?
तो नारद जी ने उन्हें वही सर्वश्रेष्ठ बिज मंत्र बताया जिसके आधार से यह पचास कोटि योजन पृथ्वी स्थिर हुई है ऐसा "र"कार तथा "म"कार युक्त "राम" नाम लिखो और उसे प्रदक्षिणा करके बैठ जाओ और कोई पूछे तो पृथ्वी स्थिर होनेमे सहाय्यक "राम" नाम की महत्ता बता देना। गणेशजी ने वही किया। "राम" नाम धरती पर लिखकर उसे प्रदक्षिणा करके आकर बैठ गये जब सभी देविदेवता आकर इकठ्ठा हुए तो गणेश जी पहले आकर बैठा हुआ देखकर अचरज हुआ।
जब उन्होंने इस बात का स्पष्टिकरण बताया तो यही निर्णय हुआ की गणेशजी यह सिर्फ प्रथम पूजनीय ही नही तो सबसे श्रेष्ठ बुद्धिमान देवता के रूप में पूजनीय होंगे और इतनाही नही तो रिध्दि सिध्दि भी उनकी सेवामे हमेशा तत्पर रहेगी। इस प्रकार से गणेश-गणपति प्रथम पूजनीय कहलाए गये माने गए।

©सन्दर्भ- सतस्वरुप आनंदपद ने:अन्छर निजनाम ग्रंथ से।

......................रामस्नेही शानूभाई
09423492193
09765282928

।। राम राम सा।।

Tuesday, 2 September 2014

।। गुरु महाराज का शरीर ।।

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙

।। राम राम सा।।

प्रश्न- आदि सतगुरु महाराज के जन्म के बारे में जानकारी दीजिये.....
(राजस्थान से विपुल और सूरज का प्रश्न था)

कुछ संतो ने गुरुमहाराज के जन्म का वर्णन किया है..लेकिन ....
आदि सतगुरु महाराज का जन्म हुआ ही नही... (मालिक-साहेब-परमात्मा) ने जिस बालक के शरीर में प्रवेश किया उस बालक के शरीर का नाम "सुखराम" ऐसा था...
वह मालिक परमात्मा स्वयं अपनी मर्जी के मालिक हर युग में जीवो के लिए आते है....
इस कलियुग में वे जिस शारीर में आये उसका वर्णन एवम जानकारी

जन्म- समंत १७८३ चैत्र शुध्द ९ - गुरुवार - पुष्य नक्षत्र.

शारीर का त्याग- समंत १८७३ कार्तिक शुध्द - १२ गुरुवार - आश्विन नक्षत्र (दोय घड़ी तड़के)

अंग्रेजी तारीख-
जन्म- 4 अप्रेल, 1726
शरीर त्याग- 31 अक्टूबर, 1816

मृत्युलोक में वास- ९० साल, ६ महीने, २७ दिन.

आदि सतगुरुजी महाराज के शरीर की अधिक जानकारी

पिता- आइदानजी
माता- बगतु बाई
भाई- तुलसा जी
(दूसरा जन्म -गिरधारी)

पत्नी- १) सांख्या की कलु
           २)....................
           ३) जमराज की       भेज्योडी

पुत्र- १) सुजाजी
        २) बगतरामजी
        ३) मानजी

कुल- गुजर गौड़ पंचारिया ब्राह्मण
जन्मस्थान- भरतखंड-मरुधर(राजस्थान)- जोधपुर जिला-बिराई ग्राम
यहाँ से पडोस में एक पहाड़-टीला वहाँ एक पथ्थर पर बैठकर 18 साल भजन किया और मोक्ष का मार्ग खुला किया।

रामद्वारा-जलगाव में उपलब्ध वाणीजी अनुसार यह समग्र जानकारी आदि सतगुरु साहेबजी महाराज के जिवणी से संकलित की गयी है और अधिक जानकारी चाहते हो तो आप रामद्वारा जलगाव के प्रवर्तक गुरूजी से ले सकते हो।

......................शानू भाई

09423492193
09765282928

।। राम राम सा।।
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Sunday, 22 June 2014

।। परम मोक्ष।।

⊙ मिशन सतस्वरूप⊙
****।। परममोक्ष।।****

मोख मोख केता सब कोई।
सो ये मारग होई रे।।
सो परगट किया हम जूग में।
निरख परख लो सोई रे।।
.............................।। आदि सतगुरु।।

वास्तव मैं मोक्ष का रास्ता दसवें द्वार से होकर जाता है। हमारे शरीर के 9 द्वारों से हम परिचित है और इन्ही मैं हम वर्तते है... दो द्वार कानों के छेद है।दो द्वार नाक के छिद्र है| दो द्वार आँखों के छिद्र है| एक द्वार मुंह का छिद्र है| एक द्वार लिंग या योनी का होता| एक द्वार गुदा का होता है| मोक्ष का दसवां द्वार गुप्त है और इसी शरीर मैं है। अगर मनुष्य उसको जान ले और गुरु की बताई साधना कर ले| यदि साधना मैं थोड़ी ऊँचाई प्राप्त कर ले तो जन्म मरण के चक्कर से मुक्त हो जाता है| उसके दसवे द्वार खुलकर उसके परे उसे अखंड ध्वनी सुनाई देगी। ये दोनों ज्ञान 'राम' के मंत्र से होते ही जिन्हे केवल सतगुरु से ही प्राप्त किया जा सकता है ।
यह 'राम' नाम तारक मंत्र है। इसका सुमिरन ब्रह्मा-विष्णू-महेश-शक्ति तथा सभी देवीदेवता करते है।
इसमे "र" कार यह ब्रह्म वाचक अक्षर है और "म" कार यह माया  वाचक अक्षर है। इस माया तथा ब्रह्म के परे वह परमात्मा है। इन दो अक्षरों को श्वास-उश्वास में मथने से इससे "ने:अक्षर" की प्राप्ति होती है और यह "ने:अक्षर" ही सतगुरु की सत्तासे शिष्य के घट में प्रगट होता है। इस "ने:अन्छर" से ही दसवाँ द्वार खुलता है। जगत के सभी मार्ग "होनकाल परब्रह्म" तक ही पहुंचते है। सिर्फ सतगुरु द्वारा "ने:अन्छर" की प्राप्ति किया हुआ जिव ही अपना दसवाँ द्वार खोलकर  होनकाल परब्रह्म के परे "अमरलोक" मे जाता है और अपना "आवागमन" (जन्म-मरण) का चक्र मिटा सकता है।

© संदर्भ ग्रन्थ- "सतस्वरुप आनंदपद ने:अन्छर निजनाम"

।।आदि सतगुरु, सर्व आत्मओंके सतगुरु, सर्व श्रृष्टि के सतगुरु, सतगुरु सुखराम जी महाराज ने धन्य हो, धन्य हो, धन्य हो।।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे - रामद्वारा-जलगाव-औरंगाबाद-पुणे.

।। राम राम सा।।

Wednesday, 4 June 2014

।। आदि सतगुरु।।

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
...।। आदि सतगुरु।।...

प्रश्न - हम सतगुरु सुखरामजी महाराज को
आदि सतगुरु -सर्व आत्माओ के सतगुरु-सर्व सृष्टि के सतगुरु
क्यों कहते है ?

उत्तर - सतगुरु सुखरामजी महाराज जी की "अनभे वाणीजी" में विठ्ठलराव संवाद-कुंडली-६६ में....

"मै सतगुरु हु आद का, आतम का गुरु कवाय।
मेरी महिमा अगम है,
क्या जाने जग माय।।

इस प्रकार से कहा गया है।

वैसे ही ....
"अगाध बोध" ग्रन्थ - चौपाई १५४  में...

"म गुरुदेव सिस्ट सबहिका,
जान मा जाने कोई ।
मोसु मिल्या अगम घर मेलु,
आनंद पद में सोई ।।

इसलिए हम गुरु महाराज को……

मै सतगुरु आद का=आदि सतगुरु,

आतम का गुरु कवाय =सर्व आत्माओ के सतगुरु,

मै गुरुदेव सिस्ट सबहीका=सर्व सृष्टि के सतगुरु

ऐसा संबोधन करते है।

"सतस्वरुप आनंद्पद ने:अन्छर निजनाम ग्रन्थ से"

* आप सभी संतो की जानकारी के लिए *
(उपरोक्त उपाधि की खोज, अभ्यास, मेहनत, लगन का श्रेय गुरु महाराज के प्रति असीम श्रद्धा रखने वाले हमारे मार्गदर्शक गुरुदेव मा. श्री. जगतपलजी चांडक, प्रवर्तक- रामद्वारा जलगाव इनको जाता है।)

धन्यवाद।

© रामद्वारा-जलगाव
रामस्नेही...शानुभाई...पुणे

।। राम राम सा।।

Saturday, 31 May 2014

समझ सिमरो राम

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⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙

प्राणिया रे
समझ सिमरो राम।
देख बिचार
समझ कर दिल में।
हरि बिन झूठा काम।

आदि सतगुरु सुखराम जी महाराज
जगत के लोगों को कहते है कि
हे प्राणी तू अपने पूत्र पत्नी
इनके लिये धन कमाता हैं,
यह एक भी तेरे साथ नहीं आएगा,
यह धन सब झुठा है।
इससे तू सदा सुखी होगा
यह तुम्हारा भ्रम हैं।
इसलिए तुम सभी यह झुठे काम
छोड़कर जो सदा के लिए
तुम्हें काल के मुख से निकालता है
ऐसे राम जी का तू
समझकर स्मरण कर।
गुरु महाराज
हंस को चेतावनी देकर समझा रहे है कि
अरे प्राणी
तू समझकर सतस्वरुपी राम का स्मरण कर। अरे प्राणी
ह्रदय में गहराई से विचार करने पर
समझेगा कि हरि के स्मरण बिना
मतलब हरि को पाने के अलावा
सभी झुठा काम हैं।
अरे प्राणी तू जगत में जो जो
मायावी क्रिया कर्म कर रहा है
वे क्रिया कर्म तुझे
काल के मुख में ले जायेगें।

।।आदि सतगुरु सुखराम जी महाराज ने धन्य हो धन्य हो।।

।। राम राम।।
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Sunday, 25 May 2014

।। रैदासा।।

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
          ।। रैदास।।

अब कैसे छूटै
राम नाम रट लागी ।

प्रभु जी,
तुम चंदन हम पानी ,
जाकी अँग-अँग बास समानी ।

प्रभु जी,
तुम घन बन हम मोरा ,
जैसे चितवत चंद चकोरा ।

प्रभु जी,
तुम दीपक हम बाती ,
जाकी जोति बरै दिन राती ।

प्रभु जी,
तुम मोती हम धागा ,
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ।

प्रभु जी,
तुम तुम स्वामी हम दासा
ऐसी भक्ति करै रैदासा ।

          है प्रभु !
हमारे मन में जो आपके नाम
की रट लग गई है,
वह कैसे छूट सकती है ?
अब मै तुमारा परम भक्त हो गया हूँ ।
जो चंदन और पानी में होता है ।
चंदन के संपर्क में रहने से पानी में
उसकी सुगंध फैल जाती है ,
उसी प्रकार मेरे तन मन में
तुम्हारा प्रेम की सुगंध
व्याप्त हो गई है ।
आप आकाश में छाए
काले बादल के समान हो ,
मैं जंगल में नाचने वाला मोर हूँ ।
जैसे बरसात में घुमडते
बादलों को देखकर
मोर खुशी से नाचता है ,
उसी भाँति मैं आपके
दर्शन् को पा कर
खुशी से भावमुग्ध
हो जाता हूँ ।
जैसे चकोर पक्षी
सदा अपने चंद्रामा की ओर
ताकता रहता है उसी भाँति मैं भी
सदा तुम्हारा प्रेम पाने के लिए
तरसता रहता हूँ ।
         है प्रभु !
तुम दीपक हो ,
मैं तुम्हारी बाती के समान सदा
तुम्हारे प्रेम जलता हूँ ।
प्रभु तुम मोती के समान उज्ज्वल,
पवित्र और सुंदर हो ।
मैं उसमें पिरोया हुआ धागा हूँ ।
तुम्हारा और मेरा मिलन
सोने और सुहागे के मिलन के
समान पवित्र है ।
जैसे सुहागे के संपर्क से
सोना खरा हो जाता है ,
उसी तरह मैं तुम्हारे संपर्क से
शुद्ध –बुद्ध हो जाता हूँ ।
हे प्रभु !
तुम स्वामी हो मैं तुम्हारा दास हूँ ।

।। राम राम सा।।