Friday, 25 November 2016

ll सत्संग ll

ll सत्संग ll

संत कबिरानी कर्मकाण्डावर जबर प्रहार करून आपल्या साहित्या मधे खालील उदाहरणा द्वारे सर्वाना सचेत केले आहे

करम गति टारे नाही टरी
मुनि वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी
सोध के लगन धरी ll
सीता हरण मरण दशरथ को
बन में बिप्पत परी
करम गति टारे नाही टरी ll
नीच हाँथ हरिश्चंद्र बिकाने
बलि पाताल परी
कोटि गाय नीत पूण्य करत नृप
गिरगिट योनी परी
करम गति टारे नाही टरी ll
पांडव जिनके आप सारथी
तिन पर विपत परी
दुर्योधन को गर्व घटायो
यदुकुल नाश करी ll
करम गति टारे नाही टरी
राहु केतु अरु भानु चन्द्रमा
विधि संयोग परी
कहे कबीर सुनो भाई साधो
होनी हो के रही
करम गति टारे नाही टरी ll

संत कबीर म्हणतात
कर्मगति कोणाच्यानेही कश्याच्याही आणि कोणत्याही विधिने टळत नाही
आपण लग्न मुहूर्त पाहुन विवाह ठरवतो
प्रत्यक्ष मर्यादापुरुषोत्तम "रामचन्द्र" यांच्या विवाहाचा मुहूर्त मोठमोठ्या ऋषि मुनि सहित स्वत: वशिष्ठ मुनिनि पाहिला तरी राज्याभिषेक सोडून वनवासात जावे लागले पुढची कथा सर्वश्रुत आहे ... सीता हरण ... दशरथाचे मरण ... वनातील विपत्ति

पुढे कबीर साहेब म्हणतात
सत्यवान म्हणून राजा हरिश्चंद्र सर्वश्रुत आहे तरी त्याला डोंबाच्या घरी पाणी भरावे लागले
ही कर्मगति होती ती कोणाच्याहीने टळली नाही
नित्य कोटि गायींचे दान करणारा राजाला "सरड्या" च्या योनीत जावे लागले
ही कर्मगति होती ती टळली नाही

नंतर कबीर साहेब म्हणतात
पांडवांचे सारथि साक्षात् श्रीकृष्ण यांच्या यादव कुळाचा नाश झाला ही कर्मगति होती ती कुणाच्यानेही टळली नाही शेवटी पारद्याच्या बाणाने मृत्यु आला ही कर्मगति होती
ती कोणाच्यानेही टळली नाही

शेवटी काय तर

कर्म प्रधान विश्व करी राखा
जिन जस किया तिन तस फल चाखा

कोणत्याही पूजापाठ विधिने कर्म कापल्या जात नाहीत उलट कर्म वाढतात आणि पुन्हा ती भोगावी लागतात
असे संत कबीर म्हणतात

Thursday, 24 November 2016

राम राम स

मन के बहुतक रंग है
छीन छीन बदले सोय
एक रंग मे जो रंगे
ऐसा बिरला कोय
__________' साहेब कबीर '

Saturday, 7 March 2015

राम राम सा

जिंदगी की डोर प्यारे
राम जी के हाँथ में
तू अकेला नही प्यारे
राम तेरे साथ में
विधि का विधान जान
हानि लाभ सहियो
जाहि विधि रखे राम
ताहि विधि रहिये
राम राम राम राम
राम राम कहियो
जाहि विधि रखे राम
ता ही विधि रहियो

Sunday, 12 October 2014

।। मेरे गुरु।।

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
***।। राम राम सा।।***

प्रश्न- कल जब मैंने गुरूजी के संदर्भ में एक अनुभव लिखा तो एक संत ने मुझसे सवाल पुछा की...
आपके गुरु कौन है ?

उत्तर- "मेरे गुरु" इस सज्ञा का श्रेय इन कुछ महानुभावों को जाता है...
.........वे निम्नलिखित है......
इन सबको धन्य धन्य कहना चाहता हूँ। क्योंकि "आदि सतगुरुजी महाराज" कहते है...
चले आपणे पाव....
धिन्न सो पंथ बतावे।।

1) भक्ति में लाने का श्रेय -
* श्री.दिपक पटेल - अग्रिम स्थान इन्हे देना चाहिए क्योंकि इन्होने मेरे लिए अपार मेहनत की अगर ये नही होते तो आज मै कहाँ होता यह मै भी नही बता सकता। इन्हे भोजन की छुट्टी एक घंटे की होती थी ये बीस मिनट में भोजन करके घर में बिविबच्चो के साथ आराम से व्यतीत करने के बजाय चालीस मिनिट मेरे दूकान पर व्यतीत करते और मै इनकी कुछ भी न सुनता एक भी न सुनता विरोध करता। फिर भी ये दुसरे दिन मुझे समझाने और हाजिर हो जाते मै चर्चा में इनका मजाक उडाता उसके बावजूद ये बुरा नही मानते और मुझे सतस्वरुप तथा होनकाल की बाते बार बार समझाते।
ये आजकल भारत में नही है अमरिका में है अगर वे नही होते तो आज मै इस भक्ति में शायद होता या नही होता ये बात गुरुमहाराज ही जाने। इसलिए इनको धन्य कहना चाहता हूँ। इनको (दीपक पटेल साहब को) जिन्होंने भेजा वे "बाविस्कर" नाम के एक गराज मेकेनिक थे। उनको भी धन्य। वे ज्यादा दिन तक भक्ति में नही रहे।

2) ने:अन्छर -निजनाम -
यह ने:अन्छर मुझे "कुद्रती" मिला।
क्योकि मुझे तम्बाखू खाने की आदत थी।
रामद्वारा में कोईभी संत मुझे "शब्द" देने को तैयार नही था। उस समय श्री. गांधी बाबा नामके एक गुजराथी संत थे उन्हें गुरूजी ने शब्द देने की अनुमति दे रखी थी लेकिन वे भी गुरूजी के अनुमति के बिना शब्द नही देते थे। साथ में ही श्री. नागतिलक साहब श्री. चौधरी साहब श्री. दीपक साहब ये ज्ञानचर्चा तथा भजन विधि बताते थे।
मेरी बोहोत चाहना थी की कोई मुझे "शब्द" दे लेकिन किसी भी संत को तम्बाखू बीडी खाने पिने वाले जिव को शब्द देने की अनुमति नही थी।
मै बोहोत धारोधार भजन करता था।
मुझे यह देखना था की ....दसवा द्वार कैसे खुलता है ? और साढ़े तीन कोटि रोमावली से भजन कैसे होता है ? अखंड ध्वनी कैसे सुनाई देती है ?
और एक दिन अचानक मुझे कंठ में हृदय में हृदय से नाभि तक "शब्द" मालूम पडा। फिर कुछ दिन बाद बंक नाल में पश्चात् पीठ की मनका तथा मेरु में ...कुछ दिन पश्चात त्रिगुटी में... इस प्रकार मुझे यह "ने:अन्छर" कुद्रती मिला। फिर मेरी तम्बाखू की आदत भी छुट गयी। फिर दसवाँ द्वार भी खुला। ये सारी बाते मुझे आजभी जैसे के वैसे स्पष्ट रूप से याद है।

3) श्रध्देय जिज्ञासुरामजी महाराज -
जिनका मेरे उपर बेहद प्रेम था जिन्होंने मुझे अपना आश्रम मुझे सौपा अपनी गादी आगे चलाने को अनुरोध किया लेकिन मैंने वह नही स्वीकार किया। जो रात दिन मुझे प्रेरणा देते रहे रात बेरात उठकर प्रश्न करते जवाब मांगते पढ़ते पढने के लिए प्रेरित करते नही आया तो समझाते ऐसे -श्रद्धेय बनबाबा महाराज - धनोडा

4) ओम प्रकाश पाण्डेय -
वक्ता के रूप में ज्ञान जिनसे लिया जिन्होंने मुझे रातदिन "बाणीजी महाराज" से किस प्रकार से जुड़े रहना ये सिखाया साखिया/पद/चौपाई/ कवित्त अन्य संतो की बाणी उसकी चाल पढने का तरीका चाल में चढाव उतार उनका उच्चारण कथा को किस प्रकार से कहना/ समयसूचकता/ हाजिर जवाबी/ चर्चा/ साम/दाम/दंड/भेद इन सब बातों से अवगत कराने वाले- आदरणीय ओम प्रकाशजी पाण्डेय इनका भी मै कुछ वर्षो तक एक अविभाज्य अंग बनके रहा इनको भी धन्य है।

5) मा. जगतपाल जी चांडक (प्रवर्तक-रामद्वारा जलगाव)
जीवन का बोहोत कुछ समय/ज्ञान/समझ/सुध बुध/व्यवहार और भक्ति की गहराई जिनसे मैंने सुनी जिनमे मै अटक गया था। इनके परे मुझे "आदि सतगुरुजी महाराज" भी नही दिखाई देते थे इन्होने मुझे स्वयं में न अटकाए हुए रखकर बार बार आदि सतगुरु जी महाराज क्या है ये बताये ही नही बल्कि समझाये आज आदि सतगुरु जी महाराज क्या है ? ये जिनसे मैंने जाना/ पहचाना/परखा उनकी सुदबुध के साथ जुडा रहा और फिर जुदा हुआ और आज यह ज्ञान/दिशा/हिम्मत/सामर्थ्य जिनकी वजह से है। जीवन का ज्यादा समय जिनके साथ व्यतीत किया जिनको मैंने स्वयं गुरु माना जिनके वर्णन के लिए मेरे पास शब्द नही है ऐसे - रामद्वारा जलगाव के प्रवर्तक - श्रद्धेय जगतपाल जी चांडक इनका मेरे जीवन में आदि सतगुरु जी महाराज के बाद का अतुलनीय स्थान है।

इनके अलावा अनेक संतोसे मैंने कुछ ना कुछ सिखा है / प्रेरणा ली है - वे - बोदेगाव के मोहन महाराज / मंगीराम जी/ लच्छीराम जी / गिरधर जी / दयाराम जी / पाटिल साहेब/ हिवरा में पधारने वाले अनेक संतश्रेष्ठ जिनके नाम याद नही लेकिन चेहरे याद है।

इस प्रकार से मुझे ये सभी गुरुदेव के रूप में मिले।
इन सभी महाभागो का हृदय दे धन्यवाद। मेरे लिए ये सभी धन्य है।

शानू भाई
9865282928
9423492193
।। राम राम सा।।

Wednesday, 3 September 2014

कामी कुत्ता

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙
***।। राम राम सा।।***

'कामी कुत्ता' तिस दिन।
अंतर रहे उदास।।
'कामी नर' कुत्ता सदा।
छह ऋतू बारह मास।।
......................।। कबीर साहब।।

'कामी कुत्ता'
तिस दिन मतलब एक माह एक ऋतू उसमे 'काम वासना' जागृत होकर वह उस काम में व्यस्त हो जाता है।
लेकिन...
'कामी नर' सदा के लिए कामवासना हृदय में लिए 'कुत्ते की तरह' जीभ से लार टपकाए बारह महीने 'काम वासना' के पीछे पडा हुआ रहता है।

.........................रामस्नेही शानुभाई
09423492193
09765282928

।। राम राम सा।।
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"गणेश" प्रथम पूजनीय कैसे ?

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙

प्रश्न- "गणेश" प्रथम पूजनीय कैसे ?

महिमा जाणी ज्यासी गणराऊ।
प्रथम पूजियत 'नाम' प्रभाऊ।।

गणपति प्रथम पूजनीय बने इसका कारण है की उन्होंने "सतस्वरुपी " राम " नाम" की महिमा जानी और प्रथम पूजनीय बने।

आदि सतगुरु सुखराम जी महाराज अपने "भुरकी ग्रन्थ" साखि ।।४०।। में भी कहते है.....

भुरकी गजानंद सुन पाई।
कुण बडपण गण ओली।।
पचासक्रोड़ पृथ्वी प्रदक्षिणा।
उभे अंक ए दो ली।।

सभी देविदेवताओं मे जब प्रथम पूजनीय कौन ? इस बात की चर्चा चली तो यह निर्णय हुआ की इस पचासक्रोड़ पृथ्वी को प्रदक्षिणा करके जो प्रथम हरिपुर में पहुंचेगा वह प्रथम पूजनीय माना जायेगा। जब पृथ्वी प्रदक्षिणा की दौड़ चली तो सभी देवी देवता अपने अपने वाहन पर बैठकर पृथ्वी प्रदक्षिणा के लिए निकल पड़े।
विष्णु अपने गरुड पर, ब्रह्मा अपने हंस पर, शिव अपने नंदी पर, इंद्रदेव अपने एरावत पर, हर कोई अपने अपने वाहन पर निकले।
"गणेश" भी अपने चूहें पर निकल पड़े...तो रास्ते में त्रिलोक की सफर करने वाले "देवर्षि नारद" मिले। अनायास ही बातचित के दौरान पृथ्वी प्रदक्षिणा की बात निकली तो "देवर्षि नारद" ने कहाँ सभी देवताओं के गतिमान वाहनों के मुकाबले आपके भारीभरकम शरीर के साथ आपका वाहन कैसे मुकाबला कर पायेगा ?
तो गणेशजी ने उनसे पूछा की ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए ?
तो नारद जी ने उन्हें वही सर्वश्रेष्ठ बिज मंत्र बताया जिसके आधार से यह पचास कोटि योजन पृथ्वी स्थिर हुई है ऐसा "र"कार तथा "म"कार युक्त "राम" नाम लिखो और उसे प्रदक्षिणा करके बैठ जाओ और कोई पूछे तो पृथ्वी स्थिर होनेमे सहाय्यक "राम" नाम की महत्ता बता देना। गणेशजी ने वही किया। "राम" नाम धरती पर लिखकर उसे प्रदक्षिणा करके आकर बैठ गये जब सभी देविदेवता आकर इकठ्ठा हुए तो गणेश जी पहले आकर बैठा हुआ देखकर अचरज हुआ।
जब उन्होंने इस बात का स्पष्टिकरण बताया तो यही निर्णय हुआ की गणेशजी यह सिर्फ प्रथम पूजनीय ही नही तो सबसे श्रेष्ठ बुद्धिमान देवता के रूप में पूजनीय होंगे और इतनाही नही तो रिध्दि सिध्दि भी उनकी सेवामे हमेशा तत्पर रहेगी। इस प्रकार से गणेश-गणपति प्रथम पूजनीय कहलाए गये माने गए।

©सन्दर्भ- सतस्वरुप आनंदपद ने:अन्छर निजनाम ग्रंथ से।

......................रामस्नेही शानूभाई
09423492193
09765282928

।। राम राम सा।।

Tuesday, 2 September 2014

।। गुरु महाराज का शरीर ।।

⊙ मिशन सतस्वरुप ⊙

।। राम राम सा।।

प्रश्न- आदि सतगुरु महाराज के जन्म के बारे में जानकारी दीजिये.....
(राजस्थान से विपुल और सूरज का प्रश्न था)

कुछ संतो ने गुरुमहाराज के जन्म का वर्णन किया है..लेकिन ....
आदि सतगुरु महाराज का जन्म हुआ ही नही... (मालिक-साहेब-परमात्मा) ने जिस बालक के शरीर में प्रवेश किया उस बालक के शरीर का नाम "सुखराम" ऐसा था...
वह मालिक परमात्मा स्वयं अपनी मर्जी के मालिक हर युग में जीवो के लिए आते है....
इस कलियुग में वे जिस शारीर में आये उसका वर्णन एवम जानकारी

जन्म- समंत १७८३ चैत्र शुध्द ९ - गुरुवार - पुष्य नक्षत्र.

शारीर का त्याग- समंत १८७३ कार्तिक शुध्द - १२ गुरुवार - आश्विन नक्षत्र (दोय घड़ी तड़के)

अंग्रेजी तारीख-
जन्म- 4 अप्रेल, 1726
शरीर त्याग- 31 अक्टूबर, 1816

मृत्युलोक में वास- ९० साल, ६ महीने, २७ दिन.

आदि सतगुरुजी महाराज के शरीर की अधिक जानकारी

पिता- आइदानजी
माता- बगतु बाई
भाई- तुलसा जी
(दूसरा जन्म -गिरधारी)

पत्नी- १) सांख्या की कलु
           २)....................
           ३) जमराज की       भेज्योडी

पुत्र- १) सुजाजी
        २) बगतरामजी
        ३) मानजी

कुल- गुजर गौड़ पंचारिया ब्राह्मण
जन्मस्थान- भरतखंड-मरुधर(राजस्थान)- जोधपुर जिला-बिराई ग्राम
यहाँ से पडोस में एक पहाड़-टीला वहाँ एक पथ्थर पर बैठकर 18 साल भजन किया और मोक्ष का मार्ग खुला किया।

रामद्वारा-जलगाव में उपलब्ध वाणीजी अनुसार यह समग्र जानकारी आदि सतगुरु साहेबजी महाराज के जिवणी से संकलित की गयी है और अधिक जानकारी चाहते हो तो आप रामद्वारा जलगाव के प्रवर्तक गुरूजी से ले सकते हो।

......................शानू भाई

09423492193
09765282928

।। राम राम सा।।
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